धन्य है हिमाचल भाजपा का सियासी कद्दूकस्स। इस कद्दुकस्स पर इतने भाजपा नेता घिसे जा रहे हैं कि इनकी सियासी हड्डियां तक का चूर्ण बनने की नौबत आ चुकी है। हैरानी की कद्दुकस्स पर जिन नेताओं को घिसा जा रहा है,वह उस दौर में भाजपा के झण्डे उठाकर डंडे खाते रहे हैं,जब पार्टी पहचान के संकट से जूझ रही थी। हालात इतने बदतर हो चुके हैं कि राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा के उस आह्वान की भी धज्जियां उड़ाई जा रही हैं,जिसमे उन्होंने कहा था कि,”भले एक भी नया कार्यकर्ता न जुड़े,पर पुराना एक भी छूटने न पाए…”

पर आलम यह है कि नयों कार्यकर्ताओं का तो कोई पता नहीं, अलबत्ता दर्जनों पुराने नेता गायब हो गए हैं या फिर कर दिए गए हैं। यकीन करना कोई मुश्किल काम नहीं है। यह लिस्ट देख लीजिए,खुद तथ्य खंगाल लीजिए।

1 ) महेंद्र नाथ सोफत

2 ) खिमी राम

3 ) ठाकुर रूप सिंह

4 ) दूलो राम

5 ) तेजवंत नेगी

6 ) नवीन धीमान

7 ) नरेंद्र अत्री

8 ) अनिल धीमान 

9 ) अजय राणा 

10 ) सुनील ठाकुर

11 ) अमित चौहान

12 ) सुभाष शर्मा

13 ) सुमित शर्मा

14 ) अशोक बकारिया

(बकाया आपकी नजरो में होंगे ही)

यह वो अहम चेहरे हैं, जिन्होंने एक दौर में कांग्रेस के मन से यह वहम निकाला था कि भाजपा इसका कुछ नहीं बिगाड़ सकती। इन नेताओं ने उस दौर में अपनी-अपनी भूमिकाओं से यह साबित भी किया था कि यह कांग्रेस का बहुत कुछ नहीं सब कुछ बिगाड़ने की हिम्मत रखते हैं।

पर अब इनका इतना कुछ बिगड़ गया है कि अब कोई इनका कुछ बिगाड़ना भी चाहे तो नहीं बिगाड़ सकता। क्योंकि इनके पास सिवाए सियासी जिल्लत के कुछ भी छीनने का लिए बकाया नही है। 

सिलसिलेवार बात करें तो सोलन जिले से महेंद्र नाथ सोफत के अच्छे दिन भाजपा में लौटने के बावजूद नहीं आए। जब जरूरत पड़ी तो इनको पार्टी में शामिल कर लिया गया। काम निपटा तो यह भी निपटा दिए गए। एक दौर में मंडी से भाजपा के प्रदेशाध्यक्ष रहे पण्डित खिमी राम का कोई अता-पता सोफत की ही तरह सरकार या संगठन में ढूंढे से नहीं मिलता। 

मंडी से ही टिकट से छिटके ठाकुर रूप सिंह का सियासी रूप लुप्त हो गया है। कांगड़ा जिले से दूलो राम के लिए तो सियासी सजाएं खत्म होने का नाम नहीं ले रही । पालमपुर से इंदु गोस्वामी आईं तो वह घर बिठा दिए गए। यह वही दूलो हैं जिनका नाम कांगड़ा संसदीय क्षेत्र में बतौर गद्दी लीडर आगे रहता है। इनकी रिप्लेसमेंट भी हो गई और पुनर्वास भी नहीं किया गया।

किन्नौर से विधायक रहे तेजवंत नेगी के तेज को तो ऐसी नजर लगी कि जिन्होंने उनको सताया उनको सरकार में सजा दिया गया और नेगी साहब को कोई सियासी नेग सरकार तो दूर की बात संगठन में भी नहीं मिला। यही हाल कांगड़ा जिले से नवीन धीमान का हुआ पड़ा है। यह भी नवीनतम राजनीतिक भूमिका को तरस गए हैं।

मंडी जिले से ही एक दौर में भाजयुमो के प्रदेशाध्यक्ष रहे नरेंद्र अत्री की तो सियासी जून ही बिगड़ गई है। जलवा ऐसा था कि सियासत में आंदोलनों के दौरान “सिर-मुंड-हड्डियां” तुड़वाने वाले अत्री को उनके सपनों का जोड़ लगाने के लिए कोई क्विकफिक्स तो दूर की बात,गोंद तक नहीं दी गई है। यह अलग बात है कि आज भी अचानक किसी से यह पूछो की भाजयुमो का अध्यक्ष कौन है तो वो अत्री का नाम ले देता है।

हमीरपुर जिले से गुरु जी के नाम से सियासत में श्रधेय रहे आईडी धीमान के बेटे अनिल धीमान को जो सबक भाजपा ने सिखाया,वह तो काफी जबरदस्त था। पहले नौकरी छुड़वा कर उपचुनाव में उतारा और अपनी इज्जत बचाई,बाद में जब आम चुनाव हुए तो गुरु जी के परिवार की इज्जत किसी को नजर नहीं आई। 

मंडी जिले के ही अजय राणा भी मौजूदा सियासी रण भूमि में काम आ गए। राणा ने हर बड़े नेता से तालमेल बनाए रखा,पर उनके साथ कदमताल किसी ने नहीं की। इनकी भी कोई पॉलीटिकल एडजस्टमेंट नहीं की गई। सिरमौर जिले से भाजयुमो के प्रदेशाध्यक्ष रहे सुनील ठाकुर भी अपनी सियासी ठकुराई न

हीं बचा सके। मौजूदा पार्टी संगठन में उनके बाद के प्रदेशाध्यक्ष तो एडजस्ट हो गए,पर सुनील अपनी चूलें हिलने से नहीं बचा सके।

शिमला के चौपाल से एक दौर में टिकट के दावेदार रहे अमित चौहान भी नई भाजपा में कहीं नजर नहीं आते। जिला बिलासपुर से भाजपा के रणनीतिकार रहे सुभाष शर्मा भी भाजपा की भविष्य की रणनीति में गायब हैं। घुमारवीं से विक्रम शर्मा भी बड़ों की लड़ाई में पिस गए थे। जिला ऊना से सुमित शर्मा भी बड़ी चक्कियों के बीच मे पिस रहे हैं। इन नेताओं ने भाजपा को आंखों पर बिठाया है। पर भाजपा ऐसे कई तमाम नेताओं को कहीं भी नहीं बिठा पाई है।

यह भी सच है कि इनमें से कई चेहरे ऐसे हैं जिनसे शांत रहने और भविष्य में सम्मान देने के वादे किए गए थे। जाहिर सा सवाल है कि आखिर ऐसे चेहरों को कब तक सियासी कद्दुकस्स पर घिसा जाएगा ? क्यों जेपी नड्डा के घर में ही उनके आदेशो तो दूर की बात,सलाह पर भी अमल नहीं किया जा रहा। 

भाजपा काडर में यह उपरोक्त हल्ला तेज होता जा रहा है। कद्दुकस्स के हिस्सों पर अलग-अलग रगड़ाई जारी है। कोई बारीक और महीन हिस्से पर रगड़ा जा रहा है तो कोई कम मोटे हिस्से पर । कइयों को सलाद काटने की तर्ज पर सियासी कद्दुकस्स के मोटे-पतले पीस निकालने वाले पार्ट पर घिसा जा रहा है। हर जिले में कोई न कोई कद्दुकस्स काम पर लगाया गया है। दर्द है तो काडर भी तड़प कर उपरोक्त समीकरण गिनवा रहा है। राष्ट्रीय अध्यक्ष के गृह प्रदेश में परदेसी बने नेताओं को कद्दुकस्स से न निकाला गया तो पहली दफा होगा कि गुट तो नहीं बनेंगे, अलबत्ता कार्यकर्ताओं के भरोसे की नींव वो भरभरा कर ढह सकती है,जिस पर कभी भाजपा की इमारत खड़ी हुई थी…